
सूं… खटर-पटर…’पिंकू पांडे उस संकरे और घुप्प अंधेरे लोहे के पाइप के भीतर अपने घुटनों और कोहनियों के बल किसी तरह रेंग रहे थे। कंधे पर रहने वाला बनारसी गमछा अब उनके मुँह पर कसकर बंधा हुआ था ताकि फेफड़ों में धूल न जमा हो जाए। बनारस की संकरी और भूलभुलैया जैसी गलियों में छुपकर भागने का पुराना तजुर्बा आज अंतरिक्ष के इस अनजान कोने में पिंकू के बड़े काम आ रहा था।पिंकू पांडे बिना पीछे देखे बस आगे की तरफ सरपट बढ़ते जा रहे थे। पाइप के भीतर का सन्नाटा और गहरा अंधेरा किसी का भी कलेजा कँपाने के लिए काफी था। पिंकू की हालत भी पतली हो रही थी, पर हिम्मत जुटाकर और बाबा भोलेनाथ का नाम जपते हुए वे धीरे-धीरे आगे सरकते रहे।
स्पेसशिप में बनारसी मन्नत
पिंकू ने मन ही मन बुदबुदाते हुए कहा, “हे बजरंग बली! आज बचाए लो बाबा। अगर यहाँ से सही-सलामत ज़िंदा लौटे ना, तो संकट मोचन मंदिर में पूरे पांच किलो का बूंदी का देसी घी का लड्डू चढ़ाएंगे। साला हाई स्कूल का गणित का इम्तिहान भी इस लोहे की चूहेदानी में रेंगने से सौ गुना ज़्यादा आसान था!”पिंकू अभी रेंगते हुए कुछ ही दूर पहुंचे थे कि अचानक उनके आगे की ज़मीन गायब हो गई। दरअसल, उस लोहे के पाइप का सिरा नीचे की तरफ खुला हुआ था।जब पिंकू ने नीचे की ओर झाँका, तो उनकी आँखें फटी की फटी रह गईं। नीचे एक बेहद आलीशान, चमचमाता हुआ गोल नियंत्रण कक्ष (Control Room) था। उस विशाल कमरे के ठीक बीचों-बीच एक स्टील की भव्य कुर्सी रखी थी, जिसके सामने किसी हवाई जहाज़ के कॉकपिट जैसा एक विशाल ‘कंट्रोल पैनल’ लगा हुआ था।कंट्रोल रूम में धड़ाम छलांग (इसे भी ब्लॉग में H2 हेडिंग बना दें)उस पैनल पर हज़ारों रंग-बिरंगे बटन किसी जुगनू की तरह भुक-भुक करके जल-बुझ रहे थे। पूरे कमरे में लाल रंग की आपातकालीन (Emergency) लाइटें गोल-गोल घूम रही थीं और चारों तरफ साइरन की डरावनी आवाज़ गूँज रही थी।पिंकू ने एक लंबी और गहरी सांस ली, बजरंग बली का नाम लिया और पाइप से सीधे नीचे की तरफ छलांग लगा दी—’धड़ाम!’वे सीधे जाकर उस मुख्य कंट्रोलर कुर्सी पर ही गिरे। वह कुर्सी इतनी मखमली और मुलायम थी, मानो बनारस के किसी रईस सेठ का गद्देदार सोफा हो!
पिंकू झटके से अपनी जगह पर खड़े हो गए और सामने का नज़ारा देखकर उनका मुँह अचरज से खुला का खुला रह गया। सामने कोई लोहे की बंद दीवार नहीं थी, बल्कि एक विशालकाय पारदर्शी कांच की खिड़की थी। उस खिड़की के पार नीले-काले अनंत अंतरिक्ष में लाखों टिमटिमाते तारे और चमकते हुए रहस्यमयी ग्रह तैर रहे थे। कुछ दूरी पर एक बड़ा सा खूबसूरत नीला गोला दिखाई दे रहा था—उनकी अपनी प्यारी पृथ्वी!
अंतरिक्ष में हरी चटनी वाले जीव
पिंकू पांडे ने अपनी आँखें फाड़कर देखते हुए कहा, “अरे दादा रे! ई तो सचमुच का आसमान है बे! हम तो सोचे रहे कि कोई हमको नींद की दवाई सुंघाकर रामनगर के किले में बंद कर दिया है। ई हरी चटनी वाले एलियन तो हमको सीधे ब्रह्मांड के पार उठा लाए!”तभी अचानक पूरी स्पेसशिप ज़ोर से हिली—’कड़कड़ड़ड़!’कांच के उस पार पिंकू ने देखा कि दूर से तीन-चार छोटी, डरावनी काली उड़नतश्तरियां उनकी इस बड़ी स्पेसशिप की तरफ बड़ी तेज़ी से बढ़ रही थीं। उन तश्तरियों से नीले रंग की घातक लेज़र बीम (मिसाइल जैसी रोशनी) लगातार निकल रही थी।कंट्रोल पैनल और घबराए पिंकू पांडे (इसे भी ब्लॉग में H2 हेडिंग बना दें)तभी स्पेसशिप का मुख्य कंप्यूटर रोबोटिक आवाज़ में ज़ोर से चिल्लाया—”वार्निंग! एनिमी शिप्स अप्रोचिंग! शील्ड कैपेसिटी 20%!”पिंकू पांडे झटके से वापस उसी मखमली कुर्सी पर जा गिरे। उनके ठीक सामने कंट्रोल पैनल पर लाल, पीले, नीले और हरे रंग के हज़ारों बटन टिमटिमा रहे थे। यहाँ हालत यह थी कि उन्हें कोई गाड़ी चलाना तो दूर, अपनी साइकिल की उतरी हुई चेन चढ़ानी भी ठीक से नहीं आती थी।पिंकू पांडे ने घबराकर अपना सिर पकड़ते हुए कहा, “अरे बाप रे! ई तो बिना ड्राइवर की बैलगाड़ी है! कौन सा बटन दबाएं? ई लाल वाला दबाएं का? नहीं-नहीं, लाल मतलब खतरा होता है। साला हमारी खोपड़िया एकदम कन्फुसिया गई है रे बाबा!”
अम्मा की तोरई का नुस्खा और हरा बटन
तनाव के मारे पिंकू के हाथ कांप रहे थे। तभी अचानक उनकी नज़र पैनल के बिल्कुल बीचों-बीच चमक रहे एक बड़े, गोल ‘हरे बटन’ पर पड़ी। हरा रंग देखते ही पिंकू के दिमाग की बत्ती झनझनाकर जल उठी। उनके कानों में बनारस वाले घर की रसोई से आती अपनी अम्मा की कड़क आवाज़ गूँज उठी—”हरी सब्जी और तोरई खाओ पिंकू, इससे शरीर और दिमाग में सुपर एनर्जी आवत है!”पिंकू पांडे ने एक पल के लिए अपनी आँखें बंद कीं, मुँह का थूक निगला और उनके चेहरे पर एक बनारसी मुस्कान तैर गई।पिंकू ने कहा, “अरे! अम्मा हमेशा कहती रही कि हरे रंग में ताकत होती है। तो साला ई हरा बटन दबाई देई, तो ई लोहे के डिब्बे जैसे उड़ने वाले प्लेन मा भी सुपर-फास्ट एनर्जी आ जाएगी का? दबाई देते हैं बजरंग बली का नाम लेके! जो होगा देखा जाएगा!”पिंकू पांडे ने आव देखा न ताव, पूरी ताकत से अपनी भारी-भरकम हथेली उस चमकीले हरे बटन पर दे मारी—’ठाँय!’बटन दबते ही स्पेसशिप के भीतर एक भयानक और दिल दहला देने वाली गड़गड़ाहट हुई। एक ज़बरदस्त झटका लगा और पूरे सिस्टम से एक अजीब सी तेज़ आवाज़ गूँज उठी।
भूंऊऊऊऊऊ!’ कुर्सी के पीछे से दो लोहे के बेल्ट निकले और उन्होंने पिंकू को कुर्सी से कसकर बांध दिया। स्पेसशिप के पीछे लगे विशाल रॉकेट बूस्टर्स ने नीली आग छोड़ी। अगले ही पल, वो बड़ी स्पेसशिप किसी बुलेट ट्रेन की रफ़्तार से सीधे उन विलेन एलियंस की शिप्स को चीरती हुई, अंतरिक्ष की गहराइयों में गायब हो गई।रफ़्तार इतनी तेज़ थी कि पिंकू का मुँह पीछे की तरफ खिंच गया और उनकी आँखें चौंधिया गईं।
वे चिल्लाने की कोशिश कर रहे थे, लेकिन मुँह से आवाज़ नहीं निकल रही थी।जब रफ़्तार थोड़ी थमी, तो स्पेसशिप एक शांत, नए ग्रह की कक्षा में तैर रही थी। पिंकू की सांसें धौंकनी की तरह चल रही थीं। वे कुर्सी पर बंधे हुए थे और हिल भी नहीं पा रहे थे।तभी, कंट्रोल रूम का मुख्य दरवाज़ा एक धीमी आवाज़ के साथ खुला—’सूं…’पिंकू ने डरते-डरते अपनी गर्दन घुमाई। दरवाज़े पर कोई डरावना, तरबूज के बीज जैसा हरा एलियन नहीं खड़ा था। वहाँ सफेद और चमकीले सिल्वर रंग के स्पेस सूट में एक बेहद खूबसूरत, सुनहरे बालों वाली लड़की खड़ी थी, जिसकी आँखों में नीली चमक थी।
अंतरिक्ष की परी
वह किसी परी जैसी दिख रही थी। उसके हाथ में एक अजीब सी लेज़र गन थी जो सीधे पिंकू की छाती पर तनी हुई थी।पिंकू पांडे:(फटी आँखों से उसे देखते हुए, धीरे से)”अरे दादा… ई अंतरिक्ष में अप्सरा कहाँ से अवत है बे? परी लोक आ गए का हम?”लड़की ने अपनी गन को थोड़ा और पास लाया और अपनी कलाई पर बंधी स्क्रीन पर उंगली चलाते हुए रोबोटिक, लेकिन सुरीली आवाज़ में बोली—”आई एम कोड नेम: P-444। तुम कौन हो और हमारे शिप पर क्या कर रहे हो? तुम्हे पहले तो यहां कभी नहीं देखा
पिंकू की और अजीब नज़रों से देख P-444 यह सोचने लगी कि यह अनोखा जीव कौन है। यह इस गृह का तो लगता नहीं है इसकी वेशभूषा और इसकी भाषा यहां की तो लगती नहीं है इन्हीं सब ख्यालों में खोई P-444 एकटक पिंकू पांडे को निहारने लगी। उसके अंदर यह ख्याल बार-बार आ रहा था कि यह दोस्त है या दुश्मन। इन्हीं विचारों में खोई हुई पी-444 ने अपनी गन को पिंकू की तरफ सीधा ताने हुए आगे बढ़ने लगी।
उधर पिंकू पांडे अपनी बड़ी-बड़ी आँखें खोलकर पी-444 को ऐसे देखने लगे, जैसे कोई ऐसी चीज़ देख ली हो जिसकी कल्पना भी न की हो। अजीब सी सनसनाहट पिंकू की खोपड़ी में होने लगी, पर वह किसी डर की वजह से नहीं, बल्कि पी-444 की सुंदरता को देखते हुए एक सुखद अनुभव की थी।
(भाग 3 समाप्त – आगे क्या होगा? क्या पिंकू पांडे इस अंतरिक्ष की परी P444 से दोस्ती कर पाएंगे।