पिंकू की परी 1

पिंकू की परी 1

“पिंकू की परी 1″यह कहानी है बनारस के घाटों से शुरू होने वाले एक अनोखे इश्क की… जहाँ एक बनारसी युवक अपनी किस्मत के मोड़ पर निकलता है एक जादुई गैलेक्सी जर्नी पर, अपनी सपनों की परी यानी एक खूबसूरत एलियन लड़की के साथ! आइए शुरू करते हैं यह सफर…”

पिंकू की परी 1 की जादुई कहानी

भारत देश का सबसे प्राचीन शहर बनारस की सुबह हो और चौराहे पर चाय-पान की दुकान पर पंचायत न हो, ऐसा तो बनारस के इतिहास में कभी हुआ ही नहीं है। सुबह की ताजी ठंडी हवा के बीच जब घाटों पर घंटियाँ बजती हैं, तो पूरा शहर भक्ति और मस्ती के रंग में डूब जाता है। लेकिन जैसे-जैसे सूरज चढ़ता है, बनारस की सड़कों की असल रंगत और यहाँ के चिरकुट टाइप पात्रों की हरकतें शुरू होती हैं। दोपहर के ठीक दो बज रहे थे। चिलचिलाती धूप में गर्मी अपने चरम पर थी, मानो आसमान से आग बरस रही हो। अस्सी घाट की तरफ जाने वाले मुख्य चौराहे पर गाड़ियों का भोंपू लगातार कान फाड़ रहा था। रिक्शावालों की घंटियाँ, दोपहिया वाहनों की कान चीरती आवाजें और ठेलेवालों की चिल्लाहट—सब मिलकर एक ऐसा कोलाहल पैदा कर रहे थे जो केवल बनारस के व्यस्त चौराहों पर ही मिल सकता है।

साइकिल वाला पिंकू को मुड़कर घूरने ही वाला था कि पिंकू ने उसे ऐसी तिरछी आँख दिखाई कि वह बिना कुछ बोले आगे निकल लिया। पिंकू अपनी इस छोटी सी जीत पर मुस्कुराते हुए आगे बढ़े और तंग गलियों के जाल में घुस गए। अस्सी और गोदौलिया के बीच की ये गलियाँ भी अजीब हैं, यहाँ रास्ते कम और पहेलियाँ ज़्यादा मिलती हैं। पिंकू अभी अपनी गली में दाखिल ही हुए थे कि सामने एक ऐसा शख्स खड़ा मिल गया जिसे देखते ही पिंकू की आधी हवा वैसे ही निकल जाती थी। वह शख्स यमराज से भी सौ गुना ज़्यादा कड़क और खतरनाक शख्सियत था—उनके अपने मकान मालिक, पंडित लल्लन तिवारी जी!

तिवारी जी हाथ में अपनी वो पुरानी, जिल्द फटी हुई रसीद बुक लिए खड़े थे और उनकी आँखों में पिछले तीन महीने के किराए का ऐसा अंगारा दहक रहा था, मानो अभी भस्म कर देंगे।

तिवारी जी (मकान मालिक, गुस्से से लाल होते हुए) अरे पांडे! ई गमछा चमकाना और चौराहे पर मटकना बंद करो और पहले पिछले तीन महीने का तीन हज़ार नौ सौ रुपया निकालो! तीन महीने से रोज नया चूर्ण दे रहे हो कि कल दूंगा, परसों दूंगा। आज अगर पैसा नहीं मिला, तो सूरज ढलने से पहले तुम्हारा ई फटा हुआ गद्दा गली के मोड़ पर फेंकवा देंगे और तुम्हारे सारे कपड़े चौराहे पर टंगवा देंगे, समझे कि नहीं?

पिंकू ने घबराने के बजाय तुरंत अपने दाँत निपोर दिए, ऐसे कि उनके लाल-लाल मसूड़े और पान रंगे दाँत चमकने लगे। उन्होंने दोनों हाथ जोड़ लिए और मखौलिया लहजे में बोले—

पिंकू पांडे – अरे तिवारी चाचा! काहे गुस्सा होकर अपना ब्लड प्रेशर बढ़ा रहे हैं? आप तो सीधे दिल पर चोट कर देते हैं, जबकि दिल तो बहुत छोटा सा चीज़ है। बस थोड़ा सा सब्र रखिए, अगले हफ्ते हमारे एक पक्के चेले की लॉटरी लगने वाली है। मुंशी जी से पक्की खबर आई है, जैसे ही वो रकम हाथ में आएगी, सबसे पहले सारा बकाया ब्याज समेत आपकी धोती में बांधकर चरणों में रख देंगे। अभी थोड़ा हमारा खोपड़ी शांत रहने दीजिए, वैसे ही गर्मी से भेजा फ्राई हो रखा है!

तिवारी जी ने गुस्से में तानकर कहा, पांडे, ये तुम्हारी चिकनी-चुपड़ी बातें अब चलने वाली नहीं हैं। कल तक का अल्टीमेटम है, पैसा नहीं तो कमरा खाली! इतना कहकर तिवारी जी पैर पटकते हुए आगे बढ़ गए।

तिवारी जी की डाँट से बचते-बचते पिंकू जैसे ही दबे पाँव अपने घर के अंदर घुसे, रसोई से उड़ती हुई एक लोहे की बेलन सीधे उनके पैरों के पास आकर गिरी और डिशुम से आवाज हुई। सामने उनकी अम्मा, जिनका गुस्सा देखकर चंडी भी शर्मा जाए, हाथ में तोरई और लौकी की टोकरी लिए मूर्ति की तरह खड़ी थीं।

अम्मा (हाथ में कमर पर टिकाते हुए) आ गए बनारस के राजा बाबू! पूरा दिन चौराहे पर मख्खी मारते हो और आवारागर्दी करते फिरते हो। ई लो, आज दोपहर में तुम्हारे लिए ताज़ी तोरई की सब्जी बनी है, चुपचाप बैठो और खाओ। हम कह रहे हैं, हरी सब्जी खाओ पिंकू, इससे शरीर और दिमाग में गजब की एनर्जी आवत है। तब जाकर तुम्हारा ई बंद ताला खुलेगा, इस बार किसी तरह हाई स्कूल का इम्तिहान पास होओगे और कम से कम मोहल्ले में नाक तो बचेगी!

पिंकू पांडे ने तोरई की थाली को ऐसे देखा जैसे वो कोई ज़हर की पुड़िया हो। उनका चेहरा गुस्से और झुंझलाहट से सिकुड़ गया।

पिंकू पांडे: – अरे धत तेरी की अम्मा! रोज़-रोज़ वही हरी तोरई, हरी लौकी! सुबह उठो तो लौकी का जूस, दोपहर में तोरई की सूखी सब्जी, रात में फिर वही कद्दू-तोरई का सूप! साला हमारा खून भी अब हरा होने लगा है, डॉक्टर को दिखाएंगे तो वो भी कहेगा कि इसमें आयरन नहीं, क्लोरोफिल दौड़ रहा है! हमको नहीं खानी तुम्हारी ई एनर्जी वाली घास-फूस सब्जी! हम तो छोले-भटूरे और कचौड़ी-जलेबी वाले खानदान के हैं!

पिंकू ने गुस्से में पैर पटका, थाली को थोड़ा सा खिसकाया और बिना कुछ खाए अपने कमरे में चले गए। कमरे में पहुँचकर वे सीधे अपने उस फटे हुए, स्प्रिंग निकले गद्दे पर औंधे मुँह लेट गए। अम्मा बाहर से लगातार बड़बड़ाती रहीं कि कर्मजले का भाग्य ही फूटा है, अच्छी चीज़ ज़हर लगती है,लेकिन पिंकू ने अपना सिर मोटे तकिए के नीचे दबा लिया और कुछ ही मिनटों में गहरी नींद में चले गए।

समय बीतता गया। रात के ठीक दो बज रहे थे। पूरा बनारस गहरी और गाढ़ी नींद के आगोश में डूबा हुआ था। तंग गलियों के कुत्ते भी जो दिनभर भौंकते रहते थे, अब शांत होकर कहीं मौरियों के पास दुबक कर सो चुके थे। चारों तरफ एक अजीब सा सन्नाटा पसरा हुआ था, जिसे केवल गंगा की लहरों की हल्की सी सरसराहट ही तोड़ रही थी। पिंकू अपने कमरे में बेसुध होकर सो रहे थे और उनके ज़ोरदार खर्राटों की आवाज़ से कमरे की पुरानी खिड़की के शीशे भी थरथरा रहे थे।

तभी अचानक, एक अद्भुत और हैरान कर देने वाली घटना घटी। पिंकू के कमरे की छोटी सी खिड़की के बाहर अचानक एक बहुत तेज़, आँखों को चौंधिया देने वाली अजीब सी चमकीली नीली रोशनी कौंधी। वह रोशनी इतनी तेज थी कि बाहर की पूरी गली किसी नीले समंदर की तरह जगमगाने लगी। इसके तुरंत बाद, कमरे की पुरानी मिट्टी की दीवारें और छत थर-थर काँपने लगीं, मानो कोई भारी भूकम्प आ गया हो। हवा में एक अजीब सी भारी गड़गड़ाहट की आवाज़ गूँजने लगी भूंऊऊऊ… भूंऊऊऊ…जैसी कोई भारी मशीन आसमान से उतर रही हो।

पिंकू की नींद इस भारी शोर और अजीब सी थरथराहट से थोड़ी सी खुली। उन्होंने अपनी आँखें पूरी तरह खोले बिना, नींद के नशे में चूर होकर बड़बड़ाते हुए अपना हाथ हवा में हिलाया और बड़बड़ाए

पिंकू पांडे- अरे अम्मा… सुबह का दूध वाला इतनी जल्दी आ गया का? खिड़की बंद करो ना… बहुत तेज़ लाइट आँखों पर पड़ रही है। सोने दो यार… साली खोपड़िया वैसे ही रातभर से सटक गई है, चैन से नींद भी नहीं लेने देती दुनिया..

लेकिन यह कोई सुबह का दूध वाला नहीं था, और न ही यह मोहल्ले का कोई आवारा कुत्ता था। वह रहस्यमयी नीली रोशनी खिड़की के शीशे को चीरती हुई सीधे पिंकू के गद्दे पर पड़ी। और अगले ही पल, किसी जादुई जासूसी फिल्म की तरह, पिंकू पांडे का पूरा शरीर उस गद्दे से करीब एक फीट ऊपर हवा में अपने आप उठ गया! वे जमीन से ऊपर उठकर हवा में बिल्कुल सीधे, किसी अदृश्य चुंबक की तरह तैरने लगे।

पिंकू हवा में गोल-गोल घूमते हुए, धीरे-धीरे खिड़की के उस चौड़े रास्ते से सीधे बाहर आसमान की तरफ खिंचे चले जा रहे थे। नीचे उनका कमरा खाली था, और जमीन पर सिर्फ उनका वो पुराना, धुल चुका तकिया धड़ाम से गिर पड़ा था।

बनारस का वो आम, हर साल हाई स्कूल में फेल होने वाला लापरवाह लड़का, अब पृथ्वी की सीमाओं को लांघकर सीधे ब्रह्मांड के सबसे बड़े और खौफनाक रहस्य की तरफ बढ़ चुका था! ऊपर बादलों के बीच एक विशालकाय, चमकती हुई लोहे की उड़नतश्तरी अपनी नीली रोशनी फैलाए उनका इंतजार कर रही थी।

(भाग 1 समाप्त – आगे क्या होगा? क्या अंतरिक्ष के एलियंस को पिंकू का बनारसी अंदाज़ और पान पसंद आएगा? या वे पिंकू को वापस धरती पर फेंक देंगे?

जानने के लिए पढ़ें भाग 2!)

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